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#Column:अहमदाबाद का कोरोना बना गले की फांस, भाजपा केजरीवाल-ममता पर नहीं कर पा रही हमला

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अरविंद केजरीवाल पर कोरोना महामारी पर लगाम लगाने के लिए काफी दबाव था. लेकिन अहमदाबाद में कोरोना के बढ़ते आतंक की वजह से भाजपा को दिल्ली में केजरीवाल और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर हमला करने का मौका नहीं मिल रहा है.

कोरोना के प्रसार पर अंकुश लगाने में नाकाम होने की वजह से रुपाणी सरकार ने अहमदाबाद नगर निगम के आयुक्त विजय नेहरा को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. उनके ऊपर आरोप लगा था कि नेहरा अहमदाबाद की स्थिति पर काबू पाने में विफल साबित हुए हैं. लेकिन विजय नेहरा को पद से हटाने के बाद भी शहर में कोरोना के प्रसार में कोई कमी नहीं आई, इसके विपरीत कोरोना संक्रमण और मृत्यु दर में वृद्धि दर्ज की गई. एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया की गुजरात यात्रा और मार्गदर्शन के बाद भी हालात में कोई सुधार नहीं देख रहा.

वास्तव में गुजरात में कोरोना की वजह से मृत्यु दर काफी कोशिशों के बावजूद भी सबसे ज्यादा है. इस लेख को लिखने के वक्त राज्य में कोरोना के 24,628 मामले और मरने वालों की संख्या 1,534 दर्ज की गई थी. इसका मतलब है कि राज्य में मृत्यु दर 6.23% था. अहमदाबाद में 16 जून को कुल मामलों की संख्या 17,299 थी जिसमें 1,231 लोगों की मौत हो चुकी है. इस प्रकार शहर में मृत्यु दर 7.17% है.

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आश्चर्य की बात ये है कि जब विजय नेहरा को उनके पद हटाया गया था. तब शहर में मृत्यु दर लगभग 6.75% के आसपास था उसके बाद इसमें वृद्धि दर्ज की गई है. जिसके बाद राज्य सरकार के लिए भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है और केंद्र सरकार के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुजरात सरकार की कार्यवाही का बचाव करना मुश्किल हो गया है. सभी राजनीतिक दल गुजरात की परिस्थिति को संभालने के लिए उच्च मृत्यु दर को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

हकीकत में गुजरात में कोरोना की वजह से मृत्यु दर अमेरिका और ब्राजील की तुलना में अधिक है. ये दोनों देश दुनिया में कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की सूचि में आते हैं और यहीं पर सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई है. इस आकड़े के बाद गुजरात सरकार के सामने समस्या खड़ी हो गई है. केंद्र के समक्ष स्थिति स्पष्ट करने के लिए गुजरात नेतृत्व भी काफी दबाव में आ गया है. तमाम प्रयासों के बावजूद भी मृत्यु दर को कम नहीं होने के बाद स्वास्थ्य महकमा पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो दो दशकों से गांधीनगर, गुजरात की नौकरशाही और राजनीति को करीब से देख रहै हैं)

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