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#Column: जिंदगी में आप सिर्फ चूक गए हैं, हाथ से अवसर निकल गया है?

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जय नारायण व्यास: जीवन में हर कोई अपनी महत्वाकांक्षाओं के साथ जीता है. बिना महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति लंगड़ा होता है. बिल्कुल उसी तरह अच्छा-बुरा सोचे बिना ही महत्वाकांक्षा को अपने ऊपर हाबी होने देने और उसके मातहत होकर पागल कुत्ते की तरह दौड़ता हुआ आदमी अंत में खुद को ही नुकसान पहुंचाता है.

सपने देखने, महत्वाकांक्षा को रखना इसमें कुछ भी गलत नहीं

जब महत्वाकांक्षाएं या सपने सच होते हैं तब खुशी तो होती ही है. लेकिन जब इसमें असफल होते हैं तब?

उसकी वजह से होने वाली निराशा आपको तोड़ ना दे इसे भी देखना उतना ही जरुरी है. याद रखें कि घोड़े की सवारी करने वाला गिरता भी है.

इसे समझने के लिए आपको मकड़ी से बड़ा कोई दूसरा गुरु नहीं मिलेगा. इसीलिए कहा जाता है –

“करतां जाण करोणियो, भोंय पड़ी पछड़ाय
वण टूटेले तांतणे, ऊपर चढ़वा जाय”

बालकाल में मेरे पिता नीचे की पंक्तियों बा- बार कहते थे

हाउ केन यू गेट अप बोय
इफ यू नेवर ट्राय
ट्राय एंड ट्राय अगैन
यू विल सक्सिड ऐलास्ट

हतोत्साहित न हों, मजबूत मनोबल वाले ही लड़ाई में जीत हासिल करते हैं.

एक उदाहरण आपके सामने रखता हूं. एक छात्र IIT में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा देता है. परीक्षा बहुत अच्छी जाती है. इस अत्यंत कठिन परीक्षा में अच्छा गुणवत्ता स्कोर प्राप्त करता है. उसके जीवन का अब तक का सबसे बड़ा सपना सच हो गया है. परिणाम देखकर उसका मन एक मोर की तरह नाचने लगता है. खुशी के इस अतिरेक में यह छात्र अपने पिता के पास पहुंचता है. वह अपने पिता को यह खबर बताने के लिए बेचैन है. पिताजी अखबार पढ़ रहे हैं. अब वह छात्र अपने पिता को यह खबर देता है कि उसने अच्छे अंकों के साथ आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास कर ली है.

पिता की स्वाभाविक प्रतिक्रिया खुशी से इन शब्दों में मिलती है “बहुत अच्छा बेटा!”

उस छात्र का दूसरा वाक्य “मैं IIT में प्रवेश लेकर आगे की पढ़ाई करना चाहता हूँ.”

अखबार पढ़ते हुए, पिता अखबार से मुंह निकालते हैं और उसके सामने देखकर दुखी स्वर में कहते हैं, “बेटा तुम बहुत होशियार छात्र हो. तुम्हारी समझ भी उतनी ही संस्कारित है. आप हमारी वित्तीय स्थिति को जानते हैं. मेरे आठ बच्चे हैं. पांच बेटियों की शादी अभी बाकी है और तीन बेटों को शिक्षित करना है. मैं एक नौकरीपेशा आदमी हूँ और IIT में पढ़ाने के लिए आर्थिक खर्च को वहन करने में असमर्थ हूं.

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आप यहां रहकर जितना चाहें पढ़ाई कर सकते हैं. ये जवाब सुनकर उस लड़के के पैर के नीचे की जमीन सरक जाती है. आशा का पक्षी आकाश पर नहीं बल्कि जमीन पर गिर जाता है. वह यह समझने के लिए परिपक्व है कि उसके पिता की बातें सच हैं. उसके बाद भी उसका दिल टूट जाता है. सपनों का महल ढह जाता है और जमीन पर गिर जाता है.

उसके कुछ दोस्तों ने उसकी पढ़ाई में मदद की है, जो उसकी तरह तेजस्वी नहीं. उन्होंने भी IIT की प्रवेश परीक्षा को पास किया है. एक समय ऐसा आता है जब ये लोग आंखों में सुनहरा सपना लेकर आईआईटी में प्रवेश लेने के लिए एक दूसरे से विदा लेते हैं. इस दौरान वह छात्र भी कुछ हद तक स्वस्थ्य हो जाता है. वह अपने प्यारे दोस्तों से स्टेशन पर मिलने जाता है. उसे देखकर एक छात्र कहता है” तुम भी अगर एडमिशन लेते तो अच्छा होता” इस दौरान क्या जवाब देगा वह छात्र?

वैसे भी वह कम बोलता था. ट्रेन अपने निर्धारित समय पर रवाना होती है. छात्र प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहता है और तब तक देखता रहता है जब तक ट्रेन के आखिरी डिब्बे के पीछे लगी टेल लैंप दिखाई देना बंद नहीं हो जाता. उसके मन में विचारों की कैसी आंधी चल रही है? उसकी जगह पर यदि आप होते तो क्या करते?

लेकिन भगवद गीता की एक सीख है जो कहता है – आप अपने सबसे अच्छे दोस्त खुद ही हो और खराब से खराब दुश्मन भी आप ही हैं. यह छात्र एक अलग मिट्टी का था. उसने अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया. अब उनके मन में केंद्रित होने वाले विचार था. काफी छात्र IIT में पढ़ रहे हैं लेकिन उनमें से सभी ऐसा नहीं कर सकते जिसे जीवन में महान उपलब्धि कहा जाए.

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इसी तरह आप कहां पढ़ाई करते हैं. कैसी संस्थान में अध्यन करते हैं. इसकी जरुरत नहीं बस अर्जुन की तरह पक्षी की आंख को देखकर आपकी आत्म-केंद्रितता और कड़ी मेहनत ही आखिरकार रंग लाती है. मैं उसमें जोड़ देता हूं- नियति के छिपे हुए आशीर्वाद भी इसके लिए आवश्यक है.

यह छात्र जीवन में कहां ​​पहुंचा होगा?

दोस्तों !! इस छात्र ने अध्ययन किया, जीवन में प्रगति हासिल की और भारत में सॉफ्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रणी स्थान हासिल किया. वे देश के सर्वश्रेष्ठ संस्थान IIM-अहमदाबाद के बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के अध्यक्ष बने. उन्होंने जिस कंपनी की स्थापना की उसे “इन्फोसिस” कहा जाता है.

क्या मुझे अभी भी इस छात्र का नाम कहना पड़ेगा?

आपकी धारणा बिल्कुल सही है. वह शख्स कोई और नहीं बल्कि इंफोसिस के संस्थापक और एक अग्रणी मानवतावादी विश्व विख्यात एन. आर नारायण मूर्ति. उनका विश्वास नीचे के एक ही वाक्य में देखा जा सकता है – “Powered by Intellect and Driven by Value”.

बुद्धिमत्ता और मूल्यनिष्ठा सच्ची प्रगति देता है. निराश मत होना. जब एक अवसर छूट जाता है, तो लक्ष्य प्राप्ति के कई अन्य अवसर आपकी प्रतीक्षा करते हैं. जरूरत है दृढ़ इच्छाशक्ति और कठोर परिश्रम का.

( विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं. लेखक गुजरात के पूर्व कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं.) 

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