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कोरोना रिपोर्ट 5: ग्राम्य अर्थतंत्र का कोरोना ने कमर तोड़ा, धंधेदार अब मजदूरी की तलाश में

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हितेश चावड़ा, खेड़ा / आणंद: पूरे देश और राज्य में तालाबंदी का असर साफ दिखाई दे रहा है. तालाबंदी की वजह दिहाड़ी मजदूर के साथ ही साथ अमीरों को भी बड़ा धक्का लगा है. इतना ही नहीं ग्रामीण इलाके रहकर छोटे-मोटे व्यवसाय कर अपना जीवनयापन करने वाले लोग अब मजदूर के रूप में काम करने के लिए मजबूर हो रहे हैं. क्योंकि अनाज मिल गया लेकिन अन्य चीजों को खरीदने लिए पैसा चाहिए जो इन लोगों के पास है नहीं.

गुजरात के ग्रामीण इलाकों में भी तालाबंदी का अनुपालन अच्छी तरह किया जा रहा है. ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग कोरोना वायरस के खिलाफ एकजुट होकर लड़ रहे है. जिसकी वजह से इनका धंधा व्यवसाय बिल्कुल बंद हो गया है. गाँवों में रहने वाला एक तबका कृषि और पशुपालन के काम से जुड़ा है. उन्हीं गांव में ऐसे लोग भी रहते हैं जो छोटा- मोटा धंधा व्यवसाय भी करते हैं. इतनी फीसद 50% ग्रामीण इलाकों में है. जिनके पास ज़मीन नहीं है. अगर किसी के पास जमीन है भी तो सिर्फ इतना कि उससे वह अपना पेट नहीं भर सकते.

लंबे तालाबंदी के बाद गांव में रहने वाले लोगों की ऐसी स्थिति हो गई है कि जो रोज़गार और छोटा-मोटा धंधा करके रोज़मर्रा का जीवन यापन करते थे. वह अब मजबूरी में मजदूरी काम की ओर रुख कर रहे हैं. ग्रामीण इलाके में लोग मुख्यरुप से ठेला लगाकर, कटलरी बेचकर, छोटी दुकान लगाकर, बर्तन बेचकर, कपड़ा बेचकर, सैलून चलाकर अपना जीवनयापन करते थे. लेकिन अब इनकी वित्तीय स्थिति इतनी खराब हो गई है कि इन लोगों को खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करना पड़ रहा है. इस स्थिति के पीछे की वजह लंबे तालाबंदी को बताया जा रहा है जिसको अचानक लागू कर दिया गया. ऐसे काम से जुड़े लोगों की दैनिक आय को बड़ा झटका लगा है. जिसकी वजह से ये लोग प्रतिदिन के खर्च और जीवन यापन के लिए मजदूरी करने लगे हैं.

मिल रही जानकारी के अनुसार सरकार ने किसानों के खाते में 2,000 रुपये आवंटित किए हैं, लेकिन जो किसान नहीं हैं, उन्हें इससे कोई लाभ नहीं हो रहा है और सरकार ने केवल अंत्योदय और बीपीएल यानी जिन्हें पहले अनाज प्राप्त होता था उन्ही को अनाज दिया जा रहा है. ऐसे में जो लोग किसान नहीं है. छोटे व्यवसाय से जुड़े हैं ऐसे लोगों को कई परेशानियों से दो चार होना पड़ रहा है. और अपने परिवार के जीवनयापन के लिए लोगों को मजबूरी में मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ रहा है.

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