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मजदूर दिवस: चिलचिलाती धूप से बचने के लिए मजदूर परिवार, सुबह 4 बजे अहमदाबाद से हुआ रवाना

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हितेश चावड़ा, खेड़ा: गुजरात को विकास की धारा पर लाने वाले मजदूर सड़क और फुटपाथ पर रहकर अपनी जिंदगी गुजराते हैं. लेकिन लंबे तालाबंदी की वजह से इन आदिवासी मजदूरों को अब पलायन करना पड़ रहा है. क्योंकि पैसा और काम दोनों नहीं मिलने की वजह से परेशान मजदूर दिवस होने के बावजूद अपने गृहनगर देवगढ़-बारिया के लिए अहमदाबाद से रवाना हो गए. चिलचिलाती धूप से बचने के लिए मजदूर परिवार ने सुबह 4 बजे अहमदाबाद से घर वापसी यात्रा की शुरूआत की

गुजरात को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के मजदूर दिन रात अपना पसीना बहाते हैं. लॉकडाउन के बाद खड़ी हुई स्थिति और सरकार की संवेदनशीलता की कमी के कारण प्रवासी मजदूर हजारों किमी दूर अपने घर पैदल चलकर जाने को मजबूर हो गए हैं.तालाबंदी के बीच विदेशों और अन्य राज्यों में फंसे अमीरों के बच्चों को वापस लाने की सरकार की ओर से व्यवस्था की गई थी, लेकिन सरकार प्रवासी मजूदरों की देखभाल करने में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं दिखा रही जिसकी वजह से इन लोगों को छोटे बच्चों के साथ चिलचिलाती धूप में पैदल अपने घर जाने को मजबूर होना पड़ रहा है.

आज तालाबंदी का 40 वां दिन है और फिर भी सरकार द्वारा ठोस उपाय और इंतजाम न होने के कारण मजदूरों को मजबूर होना पड़ रहा है, मजदूरों के पास कोई काम नहीं है और उनके पास 40 दिनों में जो पैसा था वह खर्च हो चुका है. मजदूर वह भी जो विशेष रूप से जो लोग निर्माण काम करते हैं वह सड़क पर ही रहकर अपनी जिंदगी का गुजारा करते हैं. दिन के 12 घंटे काम करते हैं और मानसून के दौरान ही घर जाते हैं. बाकी सर्दी-गर्मी में काम करते हैं. इनमें से अधिकांश मजदूर दाहोद-पंचमहल-छोटा उदयपुर और मध्य गुजरात और सौराष्ट्र से आकर मजदूरी का काम करते हैं.

आज जब मजदूर दिवस है ऐसे में लंबे तालाबंदी की वजह से आर्थिक रुप से परेशान देवघर बारिया में रहने वाले 11 मजदूर अहमदाबाद के वस्त्राल इलाके में भवन निर्माण का काम कर रहे हैं. आज तड़के 4 बजे अहमदाबाद से ये लोग अपने गृहराज्य देवगढ़ बारिया के तरफ बच्चों के साथ रवाना हुए.

देवगढ़ बारिया के मजदूर राजुभाई नाई पिछले 8 वर्षों से अपने परिवार के साथ अहमदाबाद में निर्माण का काम कर अपने परिवार का जीवन निर्वाहन करता है. उन्होंने कहा “हम 8 साल से अहमदाबाद में मजदूरी का काम करते हैं. तालाबंदी की वजह से 20 मार्च से काम बंद है. काम नहीं मिलने की वजह पैसा भी नहीं है. हमने मदद के लिए काफी इंतजार किया लेकिन मदद नहीं मिलने की वजह से अब हमें घर जाने का अलावा कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आ रहा है. पैसा नहीं है और गाड़ी चल रही है इसलिए हमें लंबा सफर पैदल तय करके जाना पड़ रहा है.

राजुभाई के साथ परिवार के सदस्यों के साथ बच्चे भी पैदल चल रहे हैं. तालाबंदी की वजह से अगर सबसे ज्यादा किसी की जिंदगी प्रभावित हुई है तो वह है दिहाड़ी मजदूर. कुछ ऐसे ही हालात नजर आ रहे हैं गुजरात के मजदूरों का जो मदद की उम्मीद छोड़कर अपने घर की ओर रवाना हो रहे हैं.

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