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चिलचिलाती धूप सिर पर गठरी, दिहाड़ी मजदूर सरकार से नाउम्मीद पैदल घर जाने को मजबूर

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कोरोना वायरस का कहर पूरे देश में फैला हुआ है. 3 मई तक पूरे देश में लॉकडाउन है. इसका सबसे ज्यादा असर रोज कमाने खानेवाले दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा है. रोजीरोटी छिनने के बाद दिहाड़ी मजदूर बेबस, मायूस, मजबूर, सूनी सड़क पर पैदल ही गांव लौटने को को मजबूर हो गए हैं. पैरों में चप्पल, कंधे पर बैग और सिर पर गमछी बांधे दिहाड़ी मजदूरों के इस जत्थे को घर पहुंचने की जल्दी है.

अब ये करें तो क्या करें. खाली जेबें, खाली पोटली, पानी की खाली बोतल लेकर सिर्फ उम्मीद के सहारे अपने गांव की ओर पैदल ही निकल पड़े हैं. कुछ ऐसा ही नजारा बचरा से 12 लोगों का जत्था 800 किमी दूर अपने गांव हिंगुटा, जालौन, उत्तर प्रदेश के लिए गुजरते मिला. इसमें बच्चे, बूढ़े, जवान, अधेड़ सब शामिल थे. दो औरतें भी हैं. जिसमें एक गर्भवती शामिल है. एक बहुत 3 माह का नन्हां बच्चा भी है. जिनको दूध की दरकार है. इस जत्थे में शामिल महेंद्र सिंह, हाकीम सिंह, मोहित कुमार, अनिल बाबू, योगेश कुमार, राजेंद्र कुमार, मनीषा देवी, सुमन देवी, कार्तिक गौरव आदि शामिल हैं.

पैदल यात्रा करने को मजबूर ये दिहाड़ी मजदूर बताते हैं कि भुखमरी जैसी हालात से बचने के लिए वे परिवार सहित सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही निकल पड़े हैं. सिर पर बोरिया-बिस्तर, गोद में बच्चे और आंखों में मदद की उम्मीद के साथ भूख-प्यास से जूझते, सड़क किनारे सुस्ताते और फिर हिम्मत जुटाकर आगे निकल रहे हैं. ये सभी ठेला खोमचा से रोजगार चलाते थे और पिछले दो साल से वहां थे. ये तो अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए काम करने के लिए झारखंड आए थे. लेकिन कोरोना के कहर ने ऐसा सितम ढाया कि खाली जेब घर लौटने को मजबूर हो गए हैं.

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