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मथुरा: श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में याचिका, दावा- ‘असली जन्मस्थान पर मस्जिद का अवैध कब्जा’

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अयोध्या के श्रीराम मंदिर के बाद अब मथुरा के भगवान श्रीकृष्ण मंदिर (Shri Krishna temple) सुर्खियों में है. दरअसल मथुरा में श्रीकृष्ण (Shri Krishna temple) जन्मभूमि पर दावे के लिए नई याचिका दाखिल हुई है. मथुरा के सिविल कोर्ट में दाखिल इस याचिका में 1968 में श्रीकृष्ण (Shri Krishna temple) जन्मस्थान सेवा संस्थान और मुस्लिम पक्ष के बीच हुए समझौते को खारिज कर जन्म भूमि पर बनी शाही मस्जिद को हटाने की मांग की गई है.

3.37 एकड़ की कृष्ण जन्मभूमि का स्वामित्व मांगा की गई है. ये विवाद भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna temple) विराजमान, कटरा केशव देव खेवट, मौजा मथुरा बाजार शहर’ के रूप में जो अगले दोस्त रंजना अग्निहोत्री और छह अन्य भक्तों ने दाखिल किया है.

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हालांकि प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 इस मामले के आड़े आ रहा है जिसमें विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मुकदमेबाजी को लेकर मालकिना हक पर मुकदमे में छूट दी गई थी, लेकिन मथुरा काशी समेत सभी विवादों पर मुकदमेबाजी से रोक दिया था. इस एक्ट में कहा गया है कि 15 अगस्त, 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस संप्रदाय का था वो आज, और भविष्य में, भी उसी का रहेगा.

याचिका में क्या लिखा

‘मथुरा के कटरा केशव देव की 13.37 एकड़ जमीन में से 2 बीघा जगह पर शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट गैरकानूनी तरीके से काबिज़ है. उसने वहां मस्जिद बना रखी है. यहीं वह जगह है जो भगवान कृष्ण का असल जन्म स्थान है.’

याचिका के मुताबिक, हज़ारों सालों से मौजूद श्रीकृष्ण (Shri Krishna temple) जन्मभूमि पर समय-समय पर कई राजाओं ने मंदिर बनवाए या पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार किया. 1616 में ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने उस जगह पर 33 लाख रुपए की लागत से भव्य मन्दिर बनवाया. 1658 में औरंगजेब शहंशाह बना, अपनी कट्टर इस्लामी फितरत के चलते उसने हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थानों के विध्वंस का आदेश दिया.

इसके बाद जनवरी 1670 में मुगल फौज ने मथुरा पर हमला कर दिया और मंदिर का काफी हिस्सा गिरा कर वहां एक मस्जिद बना दी. मंदिर की मूर्तियों को आगरा ले जाकर बेगम शाही मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफन कर दिया. ताकि नमाज के लिए जाते मुसलमान हमेशा उन्हें रौंदते हुए जाएं. यह सब कुछ खुद मुगल रिकॉर्ड में दर्ज है. दरबार में काम कर रहे लोगों के लेख में भी यह बातें मौजूद हैं.

दोबारा किया मंदिर निर्माण

1770 में मराठों ने युद्ध जीतने के बाद आगरा और मथुरा पर कब्जा कर लिया. उन्होंने मस्जिद हटाकर वहां दोबारा मंदिर बनाई. 1803 में अंग्रेजों ने पूरे इलाके पर कब्जा कर लिया. उन्होंने 13.37 एकड़ क्षेत्र वाले पूरे कटरा केशव देव को नजूल जमीन घोषित किया. 1815 में जमीन की नीलामी हुई और बनारस के राजा पटनी मल ने पूरी जमीन खरीद ली. इसके बाद मुसलमानों ने कई बार राजा पटनी मल और उनके वंशजों के खिलाफ मुकदमे किए. हर बार उनका मुकदमा खारिज हुआ. इसके बावजूद जमीन के एक हिस्से पर मुसलमानों का अवैध कब्जा बना रहा.

1944 में राजा के वंशजों से जमीन खरीदी

1944 में जुगल किशोर बिरला ने राजा के वंशजों से जमीन खरीद ली. 1951 में श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर यह तय किया गया कि वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा. 1958 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम के की नई संस्था का गठन कर दिया गया. कानूनी तौर पर इस संस्था को जमीन पर मालिकाना हक हासिल नहीं था. लेकिन इसने ट्रस्ट के लिए तय सारी भूमिकाएं निभानी शुरू कर दीं.

जुलाई 1973 में, मथुरा के सिविल जज ने समझौता के आधार पर एक लंबित मुकदमे का फैसला किया और मौजूदा संरचनाओं के किसी भी परिवर्तन पर रोक लगा दी. अगले मित्र के माध्यम से देवता द्वारा दायर मुकदमे में मस्जिद को हटाने और कथित अतिक्रमण को रोकने के लिए डिक्री को रद्द करने की मांग की गई है. भूमि को श्री कृष्ण जन्मभूमि कहा जाता है. मुकदमे में यह भी दावा किया गया कि देवता के साथ, जनम स्थान (जन्मभूमि) एक न्यायिक व्यक्ति है.

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