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15 दिनों तक पैदल चल घर पहुंचने वाले प्रवासी मजदूरों की दास्तां, कहा- लगा था जिंदा नहीं पहुंच पाएंगे

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देशभर में कोरोना वायरस संकट के चलते लगाए गए लॉकडाउन से हजारों प्रवासी मजदूरों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया. ऐसे में बड़ी संख्या में लोग अपने काम वाले शहरों से निकल कर पैदल ही घरों की तरफ निकल गए. इनमें बड़ी संख्या महाराष्ट्र में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों की रही. हाल ही में सैकड़ों की संख्या में यहां काम करने वाले मजदूर मध्य प्रदेश लौटे हैं. भरी गर्मी और लंबी दूरी के सफर में लोगों को कोई सहारा नहीं था. यहां तक की रास्ते में खाने तक की व्यवस्था नहीं थी. लेकिन हिम्मत से सभी ने घर तक सफर पूरा किया. अपनी यात्रा पर घर लौटे एक मजदूर का कहना है कि कई बार उन्हें ऐसा लगा कि वे जिंदा घर नहीं पहुंच पाएंगे. सफर में ज्यादातर जिन गांवों को हमने पार किया, वहां लोग हमारे प्रति दुश्मनी जैसा भाव दिखा रहे थे. कोरोना वायरस के बारे में लोगों में इतना डर है कि अब इंसान मुसीबत में फंसे किसी व्यक्ति की मदद तक नहीं करना चाहता है.

यह बातें कहने वाले प्रकाश ने महाराष्ट्र से 15 अप्रैल को अपना सफर शुरू किया था. खंडवा तक यात्रा की शुरुआत में उन्हें पहले तीन दिन पुलिसकर्मियों और अन्य लोगों से मदद मिली. इसकी बदौलत ही वे 800 किलोमीटर सफर करने की हिम्मत जुटा पाए. एक नाके पर पुलिसकर्मी ने उनसे हाईवे की जगह रेल पटरियों के जरिए सफर करने के लिए कहा. लेकिन कई जगहों पर मुश्किल की वजह से उन्हें हाईवे पर ही लौटना पड़ता. प्रकाश के मुताबिक, वे दो घंटे दिन और दो घंटे रात में सफर करते थे.

प्रकाश का कहना है कि भारी गर्मी की वजह से पैदल चलना भी काफी मुश्किल था. हम जिन गांवों से गुजरे उनमें से ज्यादातर हमारे प्रति गुस्से में थे. अगर हम उनसे पानी मांगते, तो वे अपने बोरवेल बंद कर लेते. हम एक के बाद एक गांव बढ़ते गए इस आशा से कि आगे कुछ दयालु लोग मिलेंगे, लेकिन इतने लंबे सफर के बाद भी किसी ने हमें खाना और पानी तक नहीं दिया. प्रकाश के मुताबिक, इस दौरान रास्ते में मिले कई अजनबियों ने उनकी मदद जरूर की. खासकर पुलिसवाले काफी दयालु रहे. उन्हें जरूर हमारी घर पहुंचने की व्यग्रता दिखाई दी होगी. उन्होंने कई जगह हमारी मदद की. हमारे लिए छोटी-छोटी दूरी के वाहन का इंतजाम किया. एक पुलिसवाले ने हमें एक किलो अंगूर खरीद कर खाने के लिए दिए.

घर पहुंचने के बाद स्थानीय सरपंच ने प्रकाश को तुरंत बाहर निकलने के लिए कहा और जेल में डलवाने की धमकी भी दी. प्रकाश ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि हमने कुछ गलत नहीं किया था. हम क्वारैंटाइन में रहने और टेस्ट कराने के लिए भी तैयार थे. इसलिए दूसरे राज्यों से लौटे गांववालों ने दूसरे प्रतिनिधियों से संपर्क किया और इसके बाद ही उन्हें वहां रहने दिया गया. प्रकाश का कहना है कि अब वे दो हफ्ते का क्वारैंटाइन पीरियड खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं. क्योंकि उनका एक छोटा फार्म और 20 लोगों का बड़ा परिवार है. बिना उनकी तनख्वाह के परिवार के लिए लॉकडाउन में समय बिताना तक मुश्किल हो जाएगा.

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